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व्यभिचार को अपराध मुक्त करने के बाद क्या परिवार नामक संस्था बची रह सकेगी?







Rajendr Singh Jadon, Chandigarh 28 Se, 2018 NewsRoots18
सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने व्यभिचार को अपराध के दायरे से बाहर कर दिया है। व्यभिचार का अपराध के दायरे में बना रहना परिवार नामक संस्था को बचाए रखने के लिए न्यूनतम निवारक था। अब न्यूनतम निवारक भी जाता रहा है। क्या गारंटी है कि इस स्वतंत्रता का दुरूपयोग महिला द्वारा महिला के खिलाफ नहीं किया जाएगा। अपराध मुक्त होने के कारण क्या गारंटी है कि एक महिला दूसरी विवाहित महिला के हितों को प्रभावित नहीं करेगी। यदि ए महिला जब  विवाहित बी महिला के पुरूष साथी से सम्बन्ध बनायेगी तो बी महिला का क्या होगा? क्या बी महिला तलाक लेने के लिए मजबूर नहीं होगी या फिर बी महिला भी कहीं व्यभिचार की तलाश करने को मजबूर नहीं होगी? जब इस तरह के सम्बन्ध आम हो जायेंगे तो ऐसे रिश्तों से जन्म लेने वाली संतानों का संरक्षक कौन होगा? तब क्या एक कानून यह भी बनाना होगा कि डीएनए परीक्षण के आधार पर जो जैविक पिता साबित हो वह अपनी संतान का पालन-पोषण करे। इस तरह से तो समाज में जटिलताएं पैदा हो जायेंगी। मौजूदा दहेज विरोधी कानून महिलाओं के हितों की रक्षा के लिए बनाया गया था लेकिन उसके दुरूपयोग के मामले भी सामने है। दहेज विरोधी कानून भी महिलाएं अपने ही वर्ग की महिलाओं के खिलाफ कर रही है। जब व्यभिचार अपराध से मुक्त होगा तो महिलाएं विवाहित पुरूष के साथ सम्बन्ध नहीं बनायेंगी और पहले से स्थापित विवाह को भंग नहीं करेंगी इस बात की क्या गारंटी है? जहां तक दो विपरीत लिंगियों में से किसी एक के व्यभिचार में लिप्त होने की स्थिति में तलाक लेने की स्वतंत्रता की बात है तो यह तो पहले से ही मौजूद थी। महिलाओं को गरिमा से जीने के अधिकार पहले से मौजूद थे। महिलाओं को समानता का दर्जा देकर हर क्षेत्र में बढाने की स्वतंत्रता पहले से मौजूद थी। इन स्वतंत्रताओं के रहते हुए व्यभिचार को अपराध मुक्त करना परिवार नामक संस्था को धीरे-धीरे समाप्त करेगा और तलाक के मुकदमे बढेंगे। 
    अभी तक अदालतें तलाक के मामलों में समझौता कराने का प्रयास करती थीं। तलाक मंजूर कराना मुश्किल काम था। तलाक की अर्जी आने पर अदालत दोनों पक्षो को काउंसलिंग में भेज देती थी। जब देश की अदालतों को परिवार नामक संस्था को बचाने के लिए इतनी चिंता थी तो अब व्यभिचार पर न्यूनतम निवारक को हटाते हुए कौन सा बेहतरी का काम किया गया है। यह तो प्रतिगामी कदम है। बेहतर होता कि व्यभिचार में लिप्त दोनों पक्षों को दोषी ठहराया जाता। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने पुरूष को भी व्यभिचार से दोषमुक्त करने का काम किया है। बेहतर होता कि दो साथियों में से कोई असंतुष्ट तलाक मांगने अदालत जता और इसकी मंजूरी पर नया जीवन शुरू करता लेकिन इस स्वतंत्रता के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि व्यभिचार होने दो और किसी को आपत्ति है तो तलाक के लिए अदालत में आओ। यह व्यभिचार के लिए कैटेलिस्ट का काम करेगा। 
    महिलाओं को संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 के तहत बराबरी दिलाने के लिए भारतीय दण्ड संहिता की धारा 497 को समाप्त किया गया है। महिलाओं की गैर बराबरी कहीं नहीं थी। यह धारा महिलाओं को पीछे रखने या कम आंकने के लिए नहीं बल्कि उनका वैवाहिक जीवन सुनिश्चित रखने के लिए थी। सुप्रीम कोर्ट चाहता तो महिलाओं की स्वतंत्रता को परिवार की सुरक्षा के संदर्भ में देख सकता था। जैसे कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी सार्वजनिक शांति व सुरक्षा के मद्देनजर देखी जाती है। सार्वजनिक शांति व सुरक्षा को खतरा बनने वाले संबोधन और भाषण रोके जाते है। अगर अभिव्यक्ति को एक बडे उद्देश्य को ध्यान में रखकर प्रतिबंधित किया जाता है तो व्यभिचार को समाज व परिवार नामक संस्था के हित में रोक देने में कहां गैर बराबरी आने वाली थी। बात यह नहीं है कि पुरूष समुदाय ही सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से असहमत है बल्कि महिला नेताओं ने भी इस पर असहमति व्यक्त की है। जब सुप्रीम कोर्ट महिलाओं के वैवाहिक जीवन को संरक्षण के लिए तीन तलाक को असंवैधानिक करार देता है तो व्यभिचार को अपराध मुक्त करते हुए क्या महिलाओं के हित सुरक्षित रह पायेंगे?
   अंतिम बात संस्कृति पर आधारित है। भारतीय संस्कृृति संयम पर जोर देती  है। वहां यौन जीवन को विवाह में स्वीकार किए गए  साथी के साथ ही पूरा करने की परम्परा रही है। कमियों को बर्दाश्त और संयम से नगण्य करने का भाव मौजूद रहा है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का फैसला विपरीतगामी और भारतीय समाज में विकृतियां पैदा करने वाला साबित होगा।  

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