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गंभीर अपराध के अभियुक्त है तो चुनाव लडने से रोका जाए !






Rajendr Jadon Chandigarh, 26 Sep, 2018 NewsRoots18
देश में राजनीति को अपराध मुक्त करने की बहस बहुत पुरानी हो चली है। हालांकि इस बहस के चलते कुछ सुधार भी हुए है। मसलन सुप्रीम कोर्ट ने दो साल की सजा पर निर्वाचित विधायक या सांसद को अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश पर अमल भी किया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने सांसदों एवं विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामलों की सुनवाई तेजी से करने के लिए विशेष अदालतें स्थापित करने के भी निर्देश दिए है। कतिपय राज्यों ने इन निर्देशों की पालना करते हुए विशेष अदालत स्थपित भी की है। अब इससे आगे के सुधार के लिए मुद्दा उठाया गया है। अब मुद्दा यह है कि गंभीर आपराधिक मामलों के अभियुक्त को चुनाव लडने से ही रोका जाए। सुप्रीम कोर्ट में इस मांग को लेकर याचिका दाखिल की गई थी। पब्लिक इंटरेस्ट फाउंडेशन ने वर्ष 2011 में इस मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। लम्बी सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने पिछले 28अगस्त को इस याचिका पर फैसला सुरक्षित रख लिया था। सुप्रीम कोर्ट ने आज फैसला सुना दिया है और इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने यह तो माना है कि गंभीर मामलों के अभियुक्तों को चुनाव लडने से रोका जाना चाहिए लेकिन इस रोक के लिए कोई न्यायिक कानून बनाने से इन्कार करते हुए कहा है कि संसद इस मुद्दे पर कानून बनाए।

 लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने देश के आम मतदाता को निराश नहीं किया है। सुप्रीम कोर्ट ने यह व्यवस्था दी है कि राजनीतिक दलों के जिन प्रत्याशियों पर गंभीर अपराध के अभियोग है उनके बारे में मीडिया के जरिए आम मतदाता को बताया जाए ताकि वे फैसला कर सकें कि उन्हें कैसा प्रतिनिधि चुनना चाहिए। राजनीति को अपराध मुक्त करने की दिशा में सुप्रीम कोर्ट का यह दूसरा महत्वपूर्ण कदम है। अब सोचनीय बात तो यह है कि राजनीति को अपराध मुक्त करने की दिशा में जो कुछ भी किया जा रहा है वह सुप्रीम कोर्ट द्वारा ही किया जा रहा है। कानून बनाने की शक्ति रखने वाली संसद अपनी शक्ति का इस्तेमाल इस मामले में नहीं कर रही है। सुप्रीम कोर्ट ने आज के फैसले में सिद्धांततः यह स्वीकार कर लिया है कि गंभीर आपराधिक अभियोग में फंसे लोगों को चुनाव लडने से रोका जाना चाहिए लेकिन उसने इस बारे में कानून बनाने का जिम्मा संसद पर ही छोड दिया है। तो अब देश को भ्रष्टाचार मुक्त करने का दावा कर रही नरेन्द्र मोदी सरकार के अलावा तमाम राजनीतिक दलों को राजनीति को अपराध मुक्त करने का साहस दिखाना चाहिए। 



देश के संविधान ने शासन को तीन हिस्सों में विभाजित किया है। इनमें कार्यपालिका,विधायिका और न्यायपालिका है। विधायिका या व्यवस्थापिका द्वारा जो भी व्यवस्था दी जायेगी उसके अनुसार कार्यपालिका को काम करना है। लेकिन न्यायपालिका का काम है कि वह देखे कि कहीं व्यवस्थापिका संविधान के सिद्धांतों के विपरीत तो नहीं जा रही। अब जबकि सुप्रीम कोर्ट ने राजनीति को अपराध मुक्त करने के लिए संसद को गंभीर अपराध के अभियोग में फंसे लोगो को चुनाव लडने से रोकने के लिए कहा है तो इस पर तुरन्त अमल किया जाना चाहिए। जब अपराध मुक्त सदन होंगे तब उम्मीद की जा सकती है कि देश में बढते तमाम किस्म के अपराधों पर रोक लगेगी। दरअसल अभी तक होता यह रहा है कि गंभीर अपराधों के आरोपों से धिरे लोग विधानसभा या संसद में पहुंचकर अपराध करने वालों का हौसला ही बढाते है। यह हौसला गिरना जरूरी है। अपराध करने वालों को यह अहसास होना चाहिए कि अपराध करने पर कोई भी उसे कानूनी कार्रवाई से नहीं बचा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने यदि यह जिम्मा संसद पर छोडा है तो सभी राजनीतिक दलों को तुरन्त पहल करते हुए अगला कदम उठाना चाहिए। यह नहीं होना चाहिए कि पिछली यूपीए सरकार की तरह दो साल की सजा पर अयोग्य धोषित करने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर रोक के लिए अध्यादेश लाने की तैयारी की जाए। 


सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला महत्वपूर्ण है। देश की समूची चुनाव प्रणाली को स्वच्छ बनाने के लिए इसे अमल में लाया जाना चाहिए। संसद और विधानसभा के चुनाव ही नहीं बल्कि शहरी निकाय,पंचायतराज संस्थाओं,छात्रसंध चुनावों,सहकारी संस्थाओं एवं अन्य सभी जनप्रतिनिधि चुनने वाली संस्थाओं के लिए यह फैसला प्रभावी किया जाना चाहिए। अक्सर यह देखने में आता है कि छात्रसंघ चुनावों की प्रक्रिया में अपराधी प्रवृत्ति के लोग प्रवेश कर जाते है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले से इन सभी संस्थाओं के चुनाव स्वच्छ किए जाएं। हाल फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को लागू करने की जिम्मेदारी चुनाव आयोग पर है। देश में चार राज्यों में विधानसभा चुनाव होने जा रहे है। इसके बाद आम चुनाव आने वाले है। यहीं से सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को लागू किया जाना चाहिए। देश के सुनहरे भविष्य के लिए यह भी जरूरी है कि राजनीति को अपराध मुक्त किया जाए। 
 

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