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दिल्ली में निर्वाचित सरकार और ब्यूरोक्रेसी के बीच तकरार





Chandigarh, 20 Sep, 2018 Newsroots18
राजेन्द्र सिंह जादौन
देश में दिल्ली पहला ऐसा राज्य बना है जहां कि निर्वाचित सरकार और ब्यूरोक्रेसी के बीच तकरार इस हद तक जा पहुंची कि मुख्य सचिव पर हमला कर दिया गया। मुख्य सचिव अंधुप्रकाश पर हमले का मामला दर्ज किया गया था और पुलिस ने जांच के बाद पिछले 20 फरवरी की इस घटना के सिलसिले में अदालत में चार्जशीट दाखिल की थी। करीब 1300 पेज की इस चार्जशीट में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल,उपमुख्यमंत्री मनीष सीसोदिया और सत्तारूढ आम आदमी पार्टी के 11 विधायकों को मारपीट के लिए अभियुक्त नामजद किया गया है। अदालत ने इन सभी अभियुक्तों को तलब किया है। इन सभी पर धमकाने और सरकारी कामकाज रोकने के आरोप लगाए गए है। स्वयं मुख्य सचिव अंशुप्रकाश ने अपने साथ हुई घटना की रिपोर्ट दर्ज करवाई थी। पुलिस ने तमाम सबूत जुटाए और आरोपपत्र दायर कर दिया। अब मामला कानून की अदालत में है और वहां पुलिस द्वारा पेश किए गए सबूतों की जांच-परख कर दोष सिद्ध करने की कार्यवाही की जायेगी। किसी भी अभियुक्त के खिलाफ आरोपपत्र दायर होने का मतलब है कि शिकायत का आधार मौजूद था। ठोस सबूतों के बगैर आरोपपत्र दायर नहीं किया जा सकता। लेकिन पुलिस ने कहीं चूक की है तो इसकी जांच-परख अदालत में की जायेगी। 




बहरहाल दिल्ली के मुख्य सचिव पर हमले के मामले में कानून अपना काम करेगा। यह अदालती लडाई दूर तक भी जा सकती है। कारण यह है कि दोनों पक्ष निचली अदालत के फैसले के खिलाफ उच्च अदालत में अपील करने के लिए स्वतंत्र होंगे। अंतिम फैसला आने में वर्षों लग सकते है। आरोप भले ही अदालत के हवाले है और अदालत ही दोषसिद्ध करने में सक्षम है। लेकिन यहां इस बात का विश्लेषण तो किया ही जा सकता है कि आखिर एक निर्वाचित सरकार और ब्यूरोके्रसी के बीच टकराव की नौबत क्यों आई? ब्यूरोक्रेसी और निर्वाचित प्रतिनिधि दोंनों को ही अपने अंदर झांकने की जरूरत है कि आखिर कहां कमी रही और टकराव की नौबत आई। कहीं अनदेखी और उपेक्षा है अथवा निहित स्वार्थ है। निर्वाचित सरकार अपनी नीतियां लागू करवाने के लिए ब्यूरोके्रसी पर निर्भर है। ब्यूरोक्रेसी को भी देश या प्रदेश की सेवा के लिए ही चयनित किया जाता है। कोई भी पक्ष मनमानी नहीं कर सकता है। सरकार के कामकाज के लिए प्रशासनिक और वैधानिक नियमावली निर्धारित है। यदि इनके दायरे में ही काम किया जाता है तो टकराव की नौबत आना ही नहीं चाहिए। 




दिल्ली में निर्वाचित सरकार और मुख्य सचिव के बीच टकराव की घटना में इस तरह दो पहलू जुडे है। पहला तो यह कि मुख्य सचिव पर हमला किया गया। यह संज्ञेय अपराध है और इसमें पुलिस की दखलंदाजी बनती है। पुलिस ने मुकदमा दर्ज किया और जांच के बाद आरोपपत्र दाखिल कर दिया। ठीक है अपराध के खिलाफ कानून अपना काम करेगा। लेकिन अपराधिक कानून से हटकर इस मामले की सिविल जांच भी होना चाहिए कि आखिर कमी किसकी ओर से रही कि मारपीट तक की नौबत आ गई। इतने उच्च स्तर पर यह घटना हुई जहां से पूरी व्यवस्था और आदर्श जारी किए जाते है। इस स्तर से जारी किए जाने वाले निर्देश पूरे समाज और कानूनी मशीनरी के लिए आदर्श होते है। ऐसी घटनाओं की पुनरावृृत्ति रोकने के लिए मुख्य सचिव के साथ मारपीट की घटना की सिविल जांच जरूरी है। वैसे निर्वाचित सरकारों का यह आरोप आम रहा है कि ब्यूरोके्रसी सहयोग नहीं कर रही। आखिर में ब्यूरोक्रेसी को निर्वाचित सरकारों की नीतियों और कार्यक्रमों के अनुसार ढलना भी जरूरी है। अन्यथा कोई सरकार जनता के साथ किए वायदे कैसे पूरे कर पायेगी। ब्यूरोक्रेसी को जिम्मेदार बनाने के लिए कोई संवैधानिक व्यवस्था अगर और सख्त करने की जरूरत है तो वह कदम भी उठाया जाए।  

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