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धान की फसल पर काला तेला का कहर, काला तेला और फंगस का कहर, कीटनाशकों के छिड़काव से किसानों की लागत बढ़ी, उत्पादन घटने की आशंका



Kurukshetra, 21 Sep, 2018 NewsRoots18
खेतों में पकने को तैयार खड़ी धान की फसल पर काला तेला का काला साया पड़ गया है। काला तेला फसलों का रस चूस कर उन्हें बर्बाद कर रहा है। रही सही कसर फंगस ने पूरी कर दी है। मौसम की नमी इन बीमारियों को खासी रास आ रही है। इससे धान के औसत उत्पादन पर विपरीत असर पड़ने का अंदेशा है। लिहाजा किसान कीटनाशकों के अंधाधुंध स्प्रे में लगे हुए हैं। जिससे फसलों का लागत मूल्य बढ़ गया है। 



खेतों में लहलहा रही धान की अधपकी फसल से किसानों को खासी उमीद थी। सरकार ने भी इस बार धान के समर्थन मूल्य में खासा इजाफा किया है, लेकिन पकने को तैयार धान की फसल को काला तेला की काली नजर लग गई है। बरसातों के इस सीजन में अधिक नमी के कारण फसलों पर काला तेला ने कहर बरपा दिया है। नमी के इस मौसम में काला तेला दिनोंदिन खूब फल-फूल रहा है। यह खतरनाक कीट धान के तने और पत्तों का रस चूस कर उन्हें सुखा रहा है। पकने को तैयार धान की फसल काला तेला के कहर से जमीन पर गिरने लगी है। रस चूस लेने के कारण तना व पत्ते बेवक्त सूख रहे हैं। नतीजतन अब धान के दूधिया दाने तक नहीं पाएंगे। इसके चलते किसान काफी परेशान हैं। रही सही कसर फंगस ने पूरी कर दी है। धान की फसल में फंगस भी तेजी से फैल रहा है। इसके चलते किसान दवाओं का छिड़काव करने में जुटे हुए हैं।




अमीन गांव के किसान अश्विनी गोस्वामी ने बताया कि पिछले 10 दिनों में काला तेला और फंगस का कहर अधिक बरपा है। धान की ज्यादातर फसलें काला तेला और फंगस की चपेट में है। इसके चलते किसानों का काफी नुकसान हो चुका है। अमीन गांव के ही किसान गोपाल चौहान ने बताया कि फंगस के कारण धान की क्वालिटी खराब हो रही है। इससे उन्हें मंडी में न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं मिलेगा, क्योंकि फंगस कारण खराब हुई धान की फसल को सरकारी एजेंसियों खरीदने में आनाकानी करती हैं। 





किसान मुकेश कुमार ने बताया कि अपनी फसलों को इन खतरनाक कीटों से बचाने के लिए हम कीटनाशकों का छिड़काव कर रहे हैं। इससे किसानों की लागत बढ़ गई है। करीब 1000 रुपए के कीटनाशक प्रति एकड़ के हिसाब से किसानों को छिड़काव करना पड़ रहा है। इसके अलावा लेबर भी काफी भारी पड़ रही है। किसानों को 2000 से भी ज्यादा का अतिरिक्त खर्च करना पड़ रहा है। इससे न केवल फसलों का लागत मूल्य बढ़ेगा, बल्कि धान की गुणवत्ता भी घटेगी। धान की मोटी किस्में ज्यादातर पकने को तैयार हैं। उनमें काला तेला से अधिक नुकसान होगा। इसके अलावा बारीक किस्में भी अब बालियां बनने की स्थिति में है। यदि काला तेला और फंगस पर नियंत्रण नहीं हुआ तो उन्हें और भी ज्यादा नुकसान होने की आशंका है।


कृषि विकास अधिकारी, रामप्रकाश ने बताया कि धान की अधपकी फसल को काला तेला के प्रकोप से बचाने के लिए छिड़काव की आवश्यकता है। इसके लिए किसानों को सुबह-शाम दोनों वक्त अपने खेत में फसल का निरीक्षण करना चाहिए। काला तेला मौसम की गड़बड़ी के कारण आता है, क्योंकि इन दिनों मौसम में नमी है और एक बड़ी वजह है दिन में तापमान ज्यादा होता है और रात को तापमान कम हो जाता है। इसी उतार-चढ़ाव के कारण काला तेला और फंगस को बढ़ने में मदद मिलती है। इसलिए किसान काला तेला से बचने के लिए दवाओं का छिड़काव करें। यदि काला तेल ज्यादा है तो चार-पांच दिन के अंतराल पर फिर से छिड़काव करने की आवश्यकता है। कोई भी किसान यदि तकनीकी जानकारी लेना चाहता है तो वह कृषि विकास अधिकारी कार्यालय में संपर्क कर सकता है। उनके लिए हम निरीक्षण कर दवाएं संस्तुत करते हैं। 

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