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भारत की राजनीति में बदलाव की पदचाप सुनने की जरूरत







Rajendr Jadon, Chandigarh, 01 Oct, 2018 NewsRoots18
भारत की राजनीति में बदलाव आ रहा है। लेकिन इसकी आहट नहीं है। यह एक पदचाप है जिसको सुनने की जरूरत है। दरअसल केन्द्र में वर्ष 2014 में सत्तारूढ भाजपा अगले वर्ष होने वाले 2019 के लोकसभा चुनाव में भी सफलता यानि बहुमत हासिल करने के सपने बुन रही है। इस सरकार ने देश के आम मतदाता को भी सपने दिखाए है। सरकार ने आम मतदाता को कहा है कि उनको दिखाए जा रहे सपने 2022 तक पूरे किए जायेंगे। मसलन सभी को आवास का लक्ष्य 2022 तक पूरा करने का प्रचार जोर-शोर से किया जा रहा है। इसी तरह किसानों की आय 2022 तक दोगुनी करने की बात की जा रही है। भाजपा ने वर्ष 2014 में ही सत्तारूढ होने के साथ ही 2022 तक के लक्ष्य बांटना शुरू कर दिया था। मतलब साफ है कि पार्टी ने अपनी कार्यनीति भी तय कर ली थी कि अगली बार कैसे सत्तारूढ होना है। अब तक केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार ने इसी रणनीति के तहत काम किया है। राज्यों में जहां भाजपा की सरकारें हैं वहां भी इसी रणनीति के तहत काम किया गया है। 
   क्या है रणनीति?


अब सवाल यह है कि यह रणनीति आखिर क्या है जिसके आधार पर भाजपा दावा कर रही है कि वह 2019 के आम चुनाव में पिछले चुनाव से अधिक सीटें जीतेगी। यह रणनीति कमजोर आर्थिक तबकों को अपनी ओर रिझाने की है। इसीलिए पार्टी ने 32 करोड से अधिक जन-धन खाते खुलवाए और करीब नौ करोड उज्जचला गैस कनेक्शन दिए गए। इसी तरह मुद्रा योजना के तहत रोजगार के लिए कर्ज दिए गए। गरीब परिवारों के कैशलैस इलाज के लिए आयुष्मान भारत योजना शुरू की गई। इस योजना के जरिए देश के पचास करोड लोगों को लाभ देने की बात की जा रही है।  बहरहाल मोदी सरकार का लक्ष्य था कि जाति आधारित राजनीति करने के बजाय आर्थिक वर्ग आधारित राजनीति की जाए और देश में बहुसंख्यक कमजोर तबके के मतदाता को रिझाया जाए। कुछ समय पहले दिल्ली में आयोजित भाजपा की राष्ट््ीय कार्यकारिणी की बैठक में भी यह खुलासा किया गया कि बजाय जाति आधारित राजनीति के आर्थिक वर्गों पर आधारित राजनीति की जाए। भाजपा को भरोसा है कि उसे गरीब तबके की भलाई के लिए किए गए कार्यों के बदले वोट जरूर मिलेंगे। 
  यह है राजनीति में बदलाव की पदचाप !


देश में अब तक जाति आधारित राजनीति की जाति रही है। इक्कीसवी सदी के पहले दशक के मध्य में क्षेत्रीय दलों ने जिस सोशल इंजीनियरिंग का प्रयोग करने की बात शुरू की थी वह कोई नई बात नहीं थी। भारतीय समाज में पेशा आधारित जातीय विभाजन हजारों वर्षों से कायम है। जब देश में लोकतांत्रिक प्रणाली लागू हुई तो राजनीतिक दलों ने बजाय आर्थिक वर्गों के आधार पर राजनीति करने के जातीय आधार पर सभी वर्गों को रिझाने का काम किया। इन दलों ने सभी जाति वर्गों के प्रभावशाली लोगों को अपने साथ जोडते हुए सोशल इंजीनियरिंग की और वोट हासिल किए। अब यदि भाजपा यह जातीय समीकरणों की राजनीति छोडकर आर्थिक वर्गों की राजनीति शुरू करती है तो यह बदलाव की पदचाप है। इससे समाज में जो जातीय विभेद फैलता है उसका शमन होगा। साथ ही सभी वर्गों के आर्थिक उत्थान की ओर ध्यान देना जरूरी हो जाएगा। आर्थिक नीतियों का निर्धारण इस तरह तय करना होगा कि सभी वर्गों का उत्थान तय हो। 

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