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ईवीएम पर खुली कांग्रेस की पोल, ईवीएम को चुनावी सिस्टम में लाने वाली कांग्रेस




Chandigarh,31March2019 NewsRoots18
भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। भारत का पहला चुनाव लोकतांत्रिक तरीके से साल 1951-52 में हुआ। चुनाव की पहले दौर की वोटिंग से लेकर अंतिम दौर की वोटिंग करवाने में पांच  महीने से ज्यादा का समय लगा। समय की बचत और चुनाव में पारदर्शिता लाने के लिये ईवीएम (इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन ) को चुनावी सिस्टम में लाया गया।

पहली बार ईवीएम का इस्तेमाल और कानूनी बाधा
ईवीएम का पहली बार इस्तेमाल केरल की परुर विधानसभा के 50 मतदान केन्द्रों पर किया गया था। 1983 में चुनावों में ईवीएम के इस्तेमाल पर वैधानिकता को लेकर  हाईकोर्ट के आदेश के बाद रोक लग गई। ईवीएम को वैधानिक रुप देने के लिये पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने दिसंबर 1988 में संसद में जनप्रतिनिधीत्व अधिनियम 1951 में नई धारा 61 जोड़ते हुये संशोधन करते हुये, ईवीएम को वैधानिक रुप दिया। 15 मार्च 1989 को कानून में संशोधन प्रभावी हो गया।   


कानूनी लड़ाई और तकनीकि परिक्षा के बाद ईवीएम इस्तेमाल को मंजूरी
1990 में भारत सरकार ने ईवीएम के इस्तेमाल पर मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों के प्रतिनिधियों की चुनाव सुधार समीति बनाई।  भारत सरकार के विधि एवं न्याय मंत्रालय ने 1992 में चुनाव करवाने संबंधी कानून 1961 में संशोधन की अधिसूचना जारी की।चुनाव आयोग ने भी ईवीएम के इस्तेमाल से पहले चुनाव ईवीएम के तकनीकि पहलुओ पर जाँच के लिये समीति बनाई और सारे तकनीकि पहलुओं की जाँच की । 1998 से भारत के लोकतंत्र ने ई-लोकतंत्र की यात्रा शुरु की और 2004 में भारत देश पूर्ण रुप से ई-लोकतांत्रिक देश बन गया। यूं कहे तो देश के सभी दस लाख से ज्यादा मतदान केन्द्रों पर ईवीएम का इस्तेमाल होने लगा।

ईवीएम का विरोध कब से हुआ शुरु
 2004 में ईवीएम में वोटिंग से ही कांग्रेस यूपीए1 की सरकार बनी। तब भी ईवीएम पर सवाल नहीं उठे। इसके बाद राज्यों में चुनाव हुये वहां भी ईवीएम का इस्तेमाल हुआ। 2009 लोकसभा चुनाव में कांग्रेस यूपीए 2 की सरकार भी ईवीएम की नीव पर ही बनीं लेकिन इस बार भी ईवीएम में गड़बड़ी की बात न तो किसी कांग्रेसी, भाजपा और ना ही किसी अन्य राजनीतिक दल के नेता के मुहं से निकली। 2014 में भाजपा की सरकार  बनने और एक के बाद एक राज्यों से कांग्रेस के सत्ता से बाहर होने के साथ - साथ ईवीएम पर सवाल खड़े होने लगे न केवल सवाल खड़े होने लगे बल्कि कांग्रेस की ईवीएम में गड़बड़ी की आवाज में अन्य दलों की आवाज मिलने से सोर जोर से होने लगा। 2004 से 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले राज्यों के चुनाव भी हुये। लेकिन ईवीएम के विरोध की कोई आवाज नहीं सुनाई दी। 2014 में नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से ईवीएम के विरोध की आवाज हर चुनाव में सुनाई देने लगी। देश के किसी भी राज्य में विधानसभा चुनाव हो, उपचुनाव हो, निगम या फिर पंचायत चुनाव तक सभी में ईवीएम के विरोध की गूंज सुनाई पड़ने लगी।

ईवीएम लाने वाली कांग्रेस का ईवीएम विरोध या मोदी विरोध
1988 में देश में कांग्रेस की सरकार थी। राजीव गांधी देश के प्रधान मंत्री थे। कांग्रेस की सरकार ने ही ईवीएम को मंजूरी दी थी। लेकिन जब 2014 में देश की बागडोर कांग्रेस के हाथों से नीकल के बाद एक - के बाद एक राज्यों से सत्ता फिस्लने के साथ कांग्रसे ईवीएम रोना रोने लगी। सही मायने में कांग्रेस ईवीएम का नहीं  बल्कि ईवीएम के जरिये मोदी का विरोध कर रही है। नरेन्द्र  मोदी की लोकप्रियता के आगे कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी और इंदिरा की प्रछाई प्रयंका तक फेल हो रही है। इस लिये कांग्रेस के इस गुस्से को ईवीएम झेल रही है।

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