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गांधी ने भगत सिंह,राजगुरु,सुखदेव को क्यों नहीं बचाया।


Chandigarh,23March2019 NewsRoots18
युवाओं के आदर्श क्रांतिकारी भगत सिंह आजादी के लिये हिंसा के रास्ते को अपनाने के समर्थक थे। 1907 में भगत सिंह का जन्म हुआ तब 38 साल के मनोहन दास करमचंद गांधी दक्षिण अफरिका में अहिंसा के मार्ग से आजादी खोज रहे थे। 1915 में गांधी भारत आये और देखते ही देखते भारत के लोगों के बीच लोकप्रिय हो गये। वहीं जवान हो रहे भगत सिंह ने आजादी के लिये क्रांति का रास्ता अपनाया।

बंदूके बो रहा हूँ।
भगत सिंह के बचपन का एक किस्सा है। एक दिन खेलते - खेलते  भगत सिंह  के हाथ अपने चाचा की बंदूक लग गई। भगत ने अपने चाचा से पुछा इससे क्या होता है चाचा ने बताया इससे अंग्रेजी हुकूमत को देश से भगाएंगे।  कुछ समय बाद अपने चाचा के साथ भगत खेत में काम करने गया। खेत में चाचा आम का पेड़ लगा रहे थे। भगत सिंह ने चाचा से पूछा क्या कर रहे हो चाचा ने उत्तर दिया मैं आम का पेड़ लगा रहा हूँ जिसपर बहुत से आम लगेंगे। इतना सुन भगत सिंह घर की तरफ दौड़ा और चाचा की बंदूक लाकर गढ्ढा खोदकर बंदूक को दबाने लगे तो चाचा ने पूछा भगत क्या कर रहे हो तब भगत सिंह ने कहा कि मैं बंदूक बो रहा हूँ जिससे कई बंदूके पैदा होगी और हम अंग्रेजो से अपना देश आजाद करवाएंगे। इससे भगत सिंह का देश की आजादी के प्रति जूनून साफ दिखता है।


अगल रास्तों के बावजूद समानता
महात्मा गांधी और भगत सिंह में कई समानता थी जिनमें देश के गरीबों के हितों को अहमियत देना था। दोनों ही चाहते थे कि देश सिर्फ राजनीतिक रुप से आजाद ना हो बल्कि देश की जनता शोषण की जंजीरों से मुक्त हो इस दिशा में एक अहिंसा के मार्ग पर अड़िग रहा तो दूसरा क्रांति के रास्ते पर चल पड़ा। धर्म के नाम पर फैलाई जाने वाली नफ़रत के विरोध में सदा दोनों ही खड़े थे।

लाला लाजपत राय की मौत का बदला
वर्ष 1928 में साइमन कमिश्न के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिस के द्वारा किये लाठी चार्ज में  लाला लाजपत राय बुरी तरह घायल हो गये। जिसके कुछ समय बाद ही उनकी मृत्यु हो गई। लाल जी के अंतिम दिनों की राजनीति से भगत सिंह सहमत नहीं थे और उन्होंने उनका विरोध भी किया। लेकिन पुलिस की कार्रवाई से लाला जी की मृत्यु से भगत सिंह क्रोधित हो गये और उन्होंने इसका बदला लेने के लिये अपने साथियों से पुलिस सुपरिटेंडेंट स्कॉट को मारने की यौजना बनाई। लेकिन एक साथी से हुई चूक की वजह से स्कॉट की जगह सांडरस की हत्या हो गई। इस मामले में भगत सिंह और उनके साथी पुलिस की गिरफत में नहीं आ सके।


बहरे अंग्रेजो की असेम्बली में धमाका और भगत सिंह को फांसी का सच
अंग्रेजी बहरी सरकार के कान खोलने के लिये भगत सिंह और उनके साथियों ने असेम्बली सभा में बम्ब फेंकर धमाका कर दिया। उस समय अध्यक्ष के तोर पर सभा की कार्यवाही का संचालन पहले भारतीय 
 सरदार पटेल के बड़े भाई विट्ठल भाई पटेल कर रहे थे। भगत सिंह किसी की जान नहीं लेना चाहते थे। लेकिन वे बहरी अंग्रेजी सरकार के कानों में देश की आवाज पंहुचाना चाहते थे। बम्ब फैंकने के बाद भगत और उनके साथी भाग सकते थे लेकिन उन्होंने भगने की बजाय गिरफ्तारियां दी। इस दौरान भगत सिंह के पास उनकी रिवॉल्वर भी थी। उसी रिवॉल्वर से अंग्रेजी सरकार ने सिद्ध किया की सांडरस की हत्या इसी रिवॉल्वर से की गई थी और सांडरस की हत्या के आरोप में  भगत सिंह को अभयुक्त बनाकर फांसी की सजा सुनाई गई।


गोलमेज सम्मेलन और समझोते पर विवाद
भगत सिंह के जेल जाने के बाद युवाओं के क्रांती की अलग ही लहर उमड़ पड़ी। भगत सिंह के सर्थन में पुरे भारत में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विरोध प्रदर्शन होने लगे। इस बीच भारत की राज्य व्यवस्था में सुधार पर चर्चा के लिये ब्रिटिश सरकार ने अलग - अलग नेताओं को गोलमेज सम्मेलन में लंदन बुलाया। इस गोलमेज सम्मेलन में गांधी और कांग्रेस के हिस्सा न लेने से सम्मेलन बेनतीजा रहा। 17 फरवरी 1931 को वॉयस रॉय अरविंद और गांधी के बीच बातचीत शुरु हुई और 5 मार्च 1931 को दोनों के बीच समझौता हुआ। इस समझौते में आजादी के लिये अहिंसक तरीके से पकड़े गये सभी क्रांतिकारियों को छोड़ने की बात तय हुई। लेकिन क्रांति के रास्ते वाले मतवाले क्रांतिकारियों और भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की फांसी की माफी पर ना तो चर्चा हुई और ना ही उन्हें माफी मिल पाई।

भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की फांसी पर विवाद
ब्रिटिश सरकार और गांधी के बीच हुये समझौते का देशभर में विरोध होना शुरु हो गया। सवाल खड़े किये जाने लगे के जब भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दी जा रही तो ऐसे समय में ब्रिटिश सरकार के साथ समझोता कैसे हो सकता है। समझोते से नाराज लोग देशभऱ में गांधी का विरोध करने लगे। देश में गांधी के विरोध और भगत सिंह व उनके साथियों के समर्थन में बढते आक्रोष को देख 23 मार्च 1931 को माँ भारती के तीनों वीर सपूतों को फांसी दे दी गई। भगत सिंह और उनके साथियों को फासी के बाद तो आक्रोश की ज्वाला  और अधिक धधकने लगी। आक्रोश की यह ज्वाला सिर्फ अंग्रेजो के खिलाफ नहीं बल्कि गांधी के खिलाफ भी था क्योंकि उन्होंने यह बात नहीं रखी की भगत सिंह की फांसी माफ नहीं तो समझोता नहीं। 

कहाँ है खूनी 
26 मार्च 1931 को करांची में कांग्रेस अधिवेशन में हिस्सा लेने जब गांधी 25 मार्च को करांची में पंहुचे तो उनका स्वागत काले कपड़े के बने फूले से हुआ। गांधी मुर्दाबाद, गांधी गो बैक के नारे लगे। कुछ लोग जहां गांधी ठङरे हुये थे वहां पंहुच गये और कहने लगे कहाँ है खूनी, इसी बीच नहरु वहां पंहुचे और प्रदर्शन कर रहे लोगों को एक तंबू मे लेजाकर तीन घंटे तक समझाया। लेकिन शाम को ये लोग फिर विरोध करने के लिये लौट आये।

नेता जी समझोते के विरोध में, तो कांग्रेस वर्किंग कमेटी समर्थन में थी।
नेता जी सुभाष चंद्र बोस और कई लोग महात्मा गांधी और अरविंद के समझोते के विरोध में थे। वे कहते थे कि जब ब्रिटिश सरकार भगत सिंह और उनके साथियों की फांसी माफ नहीं कर रही तो उनके साथ समझोता करने की क्या जरुरत है। वहीं दूसरी और कांग्रेस वर्किंग कमेटी गांधी के समर्थन में खड़ी थी।

भगत सिंह की फांसी पर गांधी का जवाब
गांधी ने भगत सिंह की फांसी पर कई प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि भगत की बहादुरी के लिये हमारे मन में सम्मान उभरता है लेकिन हम ऐसा तरीका चाहते है जिसमें आप खुद को न्योछावर करते हुये दुसरों को नुकसान ना पंहुचाये। वे कहते है सरकार गम्भीर रुप से उकसा रही है समझोते की शर्तों में फांसी रोकना शामिल नहीं था इस लिये इससे पिछे हटना ठिक नहीं था। गांधी जी अपनी किताब स्वराज में लिखते है मौत की सजा नहीं दी जानी चाहिये। वे कहते है भगत सिंह और उनके साथियों के साथ बात करने का मौका मिला होता मैं उन्हें कहता उनका चुना हुआ रास्ता गलत और असफल है। ईश्वर को साक्षी रख कर मै सत्य जाहीर करना चाहता हूँ कि हिंसा के मार्ग पर चलकर स्वराज नहीं मिल सकता  सिर्फ मुश्किलें मिल सकती है। मै जितने तरीकों से वॉयस राय को समझा सकता था मैने कोशिश की मेरे पास समझाने की जितनी सकती थी इस्तेमाल की 23वीं तारिख की सुबह मैने वॉयस राय को एक पत्र लिखा जिसमें मैने अपनी पुरी आत्मा उडेल दी। भगत सिंह अहिंसा के पूजारी नहीं थे लेकिन हिंसा को धर्म नहीं मानते थे। इन वीर सपूतों ने मौत के डर को भी जीत लिया था। उनकी वीरता को नमन है लेकिन उनके कृत्य का अनुकरण नहीं किया जा सकता। उनके कृत्य से देश का फायदा हुआ हो ऐसा मै नहीं कह सकता। खून करके अगर शोहरत हांसिल करने की प्रथा शुरु हो गई तो लोग एक दुसरे का कत्ल करके न्याय तलाशने लगेंगे। 

गांधी का सफेद झूठ
गांधी जी ने भगत सिंह की फांसी की सजा माफ करने के लिये वॉयस रॉय पर पूरी तरह से दबाव बनाया हो ऐसे सबूत ना तो शोधकर्ताओं को मिले और ना ही न्यूज रूटस 18 को मिले। फांसी के दिन सुबह गांधी जी ने जो भावपूर्ण पत्र वॉयस रॉय को लिखा वो दबाव बनाने के लिये था। लेकिन तब तक तो चिड़िया खेत चुग गई थी। इस विषय पर मौजूद रिसर्च के आधार पर ये कहा जा सकता है कि गांधी और वॉयस रॉय के बीच जो चर्चा हुई उसमें गांधी जी ने भगत सिंह व उनके साथियों को फांसी के मुद्दे को गांधी जी ने नहीं उठाया बल्कि मुद्दा उठाना जरुरी भी नहीं समझा। इस लिये गांधी जी का ये कहना कि भगत सिंह की फांसी के मुद्दे पर उन्होंने वॉयस रॉय को समझाने में अपनी पूरी ताकत लगा दी गांधी का सरा सर सफेद झूठ है। 

भगत सिंह की बाहदुरी से डरे गांधी
लोगों के विरोध को देखते हुये गांधी ने अपने खिलाफ निंदा और विरोध को अपने उपर लेते हुये अपने विचार मात्र लोगों के सामने रखे। भगत सिंह की बहादुरी को मानते हुये उन्होंने उनके क्रांति के रास्ते का स्पष्ट शब्दों में विरोध किया और गैर कानूनी बताया। इस पुरे मुद्दे पर अगर गांधी के बरताव को देखा जाये तो उनका डर समझा जा सकता है। भगत सिंह खुद अपनी सजा माफी की अर्जी देने को तैयार नहीं थे। जब उनके पिता ने भगत सिंह की सजा माफ करने की अर्जी लगाई तो उन्होंने पत्र लिखकर कड़े शब्दों में इसका विरोध किया और कहा एक भगत जायेगा हजारों लाखों भगत लायेगा। भगत सिंह की गांधी से सजा माफ करवाने को लेकर कोई नराजगी हो ऐसे साक्षय नहीं मिले। गांधी भगत सिंह की माँ भारती के प्रति भगती से डर गये थे इस लिये उन्होंने भगत सिंह को फांसी से नहीं बचाया।

शहीद दिवस के मौके पर न्यूज रुटस 18 भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव समेत देश की आजादी और आजादी के बाद अपने प्राणों की आहुती देने वाले सभी सपूतों को श्रधांजलि देता है।




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