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अपने हुए पराए और पराए हुए अपने



Chandigarh,23April,2019 NewsRoots18
सियासत बड़ी बेरहम है... न जाने सियासत में कब अपने पराए हो जाएं और पराए अपने बन जाएं! हरियाणा की राजनीति में इन दिनों यही मिजाज देखने को मिल रहा है। कल तक जो सगे थे आज वो एक दूसरे के सामने खड़े हैं... और जो दुश्मन बनकर अलग हुए थे वह है सगे बन कर साथ आ गए हैं। जी हाँ, हम बात कर रहे हैं इंडियन नेशनल लोक दल और जननायक जनता पार्टी की। कल तक अजय चौटाला और अभय चौटाला प्यारे भाई थे, लेकिन बेरहम सियासत ने दोनों को आमने-सामने लाकर खड़ा कर दिया है। मंगलवार को कुरुक्षेत्र में राजनीति का यही यही विद्रूप चेहरा दिखाई दिया। एक तरफ इंडियन नेशनल लोक दल के नेता अभय चौटाला अपने बेटे अर्जुन चौटाला का नामांकन करवाने कुरुक्षेत्र पहुंचे दूसरी तरफ अर्जुन चौटाला के खिलाफ दुष्यंत चौटाला अपनी पार्टी के प्रत्याशी जय भगवान शर्मा डीडी का नामांकन भरवाने के लिए पहुंच गए। जिस वक्त दुष्यंत चौटाला ने कुरुक्षेत्र के लघु सचिवालय परिसर में प्रवेश किया उस वक्त अभय चौटाला और अर्जुन चौटाला भी परिसर में मौजूद थे। थोड़ी देर बाद अभय और अर्जुन वहां से निकल लिए और दुष्यंत अर्जुन के खिलाफ जय भगवान शर्मा डीडी का पर्चा दाखिल करवाने निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय पहुंचे।

 दरअसल जय भगवान शर्मा भी इंडियन नेशनल लोकदल के पुराने पदाधिकारी थे और टिकट ना मिलने पर उन्होंने इंडियन नेशनल लोक दल छोड़कर कांग्रेस का दामन थाम लिया था। उसके बाद डीडी कांग्रेस के जिला अध्यक्ष भी बने। एक बार डीडी ने जिला परिषद का चुनाव जीता। कुरुक्षेत्र के पंचायत भवन में जिला परिषद के चेयरमैन पद का चुनाव हुआ तो खुद अभय चौटाला मौके पर पहुंचे थे। उस दौरान उनकी जय भगवान शर्मा डीडी के साथ झड़प हुई थी और नौबत हाथापाई तक पहुंच गई थी। तभी से जय भगवान शर्मा डीडी को अभय चौटाला बिल्कुल नापसंद करते हैं, लेकिन दुष्यंत चौटाला ने अपनी अलग पार्टी बनाते ही अपने चाचा के धुर विरोधी जय भगवान शर्मा डीडी को गले लगा लिया। इसीलिए कह जाता है कि राजनीति बेहद बेरहम है। इसमें अपने पराए और पराए कब अपने बन जाए इसका कोई इल्म नहीं होता। अब कुरुक्षेत्र के मैदान में एक तरफ अर्जुन है तो दूसरी तरफ दुष्यंत चौटाला के सेनापति जय भगवान शर्मा डीडी। यह देखना दिलचस्प होगा कि आखिर दुष्यंत खुद को राजनीति का खिलाड़ी साबित कर पाते हैं या फिर अर्जुन चौटाला अपने आप को चैंपियन के रूप में स्थापित कर पाते हैं। खुदा न खास्ता दोनों ही इस पहली सियासी पारी में नाकाम हुए तो इसका दोष बेरहम और मुखालिफ सियासत के सिर मढ़ा जाएगा।

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